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‘Atal Tinkering Lab’ will be the foundation of Make in India

'Atal Tinkering Lab' will be the foundation of Make in India
‘Atal Tinkering Lab’ will be the foundation of Make in India (ATL)

मेक इन इंडिया की बुनियाद बनेंगी ‘अटल टिंकरिंग लैब्स’

अपने देश में अभी भी विज्ञान की पढ़ाई बहुत किताबी है। 1972 में मध्य प्रदेश के होंशगाबाद जिले में विज्ञान को ‘कर-के-सिखो’ का एक नया प्रयोग शुरू हुआ, जो करीब 30 वर्षो तक चला। इसमें बच्चे प्रयोग के लिए साधारण, आसानी से मिलने वाली स्थानिय चींजे इस्तेमाल करते थे। इससे पहले यह दलिल दी जाती थी कि भारत जैसे गरीब देश में खासकर गांव के स्कूलों में महंगे ‘प्रयोगनिष्ठ’ विज्ञान को लागू करना संभव नहीं होगा। इस कार्यक्रम ने यह साबित किया कि गांव के बच्चे भी कम-खर्च में अच्छी तरह विज्ञान सीख सकते है।

आज भी ज्यादातर स्कुलों में विज्ञान का शिक्षण रटने और उसे उलटने पर आधारित है। कुछ वर्ष पहले देश के पांच महानगरों-मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली और बेंगलुरू के 17,000 बच्चे को ‘समझकर’ नहीं सीख रहे थे। सर्वे में पाठ्यक्रम से ऐसे प्रश्न चुने गए जो बच्चो की सैद्धांतिक समझ टेस्ट करें। उदाहरण के लिए बच्चों से भाप का सूत्र पूछा गया। 1. CO 2. H2O 3. O2 4. NACL भाप का कोई सूत्र नहीं होता। सही उत्तर 2 है। पर आठवी कक्षा केवल 37- प्रतिशत बच्चे ही उसका सही उत्तर दे पाये। सर्वे में पाया गया कि बच्चे दो अलग-अलग जानकारियों को आपस में जोड पाने में असमर्थ थे। वे ‘पानी’ और ‘भाप’ को अलग चीजें मान रहे थे। विज्ञान की पढ़ाई में इन कमजोरियों का एक मूल कारण है- देष की प्रमुख परीक्षाओं आईआईटी-जेईई और एनईईटी में बच्चो के व्यवहारिक ज्ञान की कोई ‘प्रैक्टिकल’ परीक्षा का न होना। इसलिए अच्छे स्कुलों में भी ‘प्रोजेक्ट्स’ और ‘मॉडल के जरिये विज्ञान सीखने पर कोई जोर नहीं है। सब जगह रटने और उलटने पर ही जोर है। शायद इसी प्रवृति ने ‘कोटा मॉडल’ को जन्म दिया। कोटा में स्पर्धा व माता-पिता की अपार अपेक्षाओं के कारण पिछले चार वर्षो में 70 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की है। अमेरिका के सबसे अच्छे कॉलेजों में दाखिले के समय छात्र के आठवीं से बारहवीं तक के प्रदर्शन, उसके द्वारा बनाए सांइस ‘प्रोजेक्ट्स’ आदी को भी ध्यान में रखा जाता है। सिलेक्शन में अंतिम परीक्षा के अंको का महत्व केवल 50 प्रतिशत होता है। चार साल पहले प्रधानमंत्री ने ‘मेक-इन-इंडिया’ का नारा दिया। पर सरकार को कहीं एहसास हुआ कि जब तक स्कूलो में बच्चे अपने हाथों से ‘मॉडल निर्माण’ नहीं करेंगे तब तक ‘मेक-इन-इंडिया’ का नारा सफल नहीं होगा। इस लिए 3 वर्ष पहले ‘अटल टिंकरिंग लैब्स’ की शुरूआत की गई। ये प्रयोगशालाएं सामान्यं बच्चों के हाथ से काम करने की कुशलताओं को निखारेंगी। अक्सर जो बच्चे रटकर अच्छे नंबर लाते हैं वे हाथ के काम में फिसड्डी हैं और जिन बच्चों के कम नंबर आते हैं वे हाथ से काम में बहुत से कुशल होते है। इससे कम अंक प्राप्त करने वाले बच्चों का भी आत्मविष्वास बुलंद होगा। देश में कोई आज 5000 स्कूलों में ‘अटल टिंकरिंग लैब्स’ कार्यरत है। इसमें सरकारी और निजि दोनो तरह के स्कूल शामिल हैं। इस कदम से सामान्य बच्चों की कल्पना को पंख मिलिंगे।

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