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Road Safety Measure in India (भारत में सड़क सुरक्षा उपाय)

road safety measures in india
Road Safety Measure in India

सड़क सुरक्षा बढ़ा रहे हैं ‘यूएन डिकेड ऑफ एक्शन’ के उपाय

कई नई सड़कों से लोगो की अपेक्षा होती है अच्छी राइडिंग क़्वालिटी की सतह और दुर्घटनाओं में कमी। लेकिन अच्छी राइडिंग क़्वालिटी के साथ वाहनों की रफ्तार निर्धारित गति सीमा से बहुत ज्यादा होने लगती है और यातायात के नियमों का अतिक्रमण होने लगता हैं। अतः दुर्घटनाएं बढ़ जाती है। भारत में सड़क दुर्घटना में प्रतिवर्ष करीब 1.50 लाख लोग मोत का शिकार हो जाते हैं, जो सारी दुनिया में सडक दुर्घटनाओं में मरने वाले लोगो का 10 प्रतिशत है। सड़क दुर्घटना में हर चार मिनट में एक व्यक्ति की जीवनलीला समाप्त हो जाती है। इन दुर्घटनाओं में देष को 2 लाख करोड़ रूपए की आर्थिक क्षति वहन करनी पड़ती है।

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने 2011 में ‘डिकेड ऑफ एक्शन’ योजना दुर्घटनाओं में मृतक-संख्या आधी करने का लक्ष्य है। दुर्घटनाओं का विष्लेषण और शोध से यह निर्धारित हुआ हैं कि सड़क सुरक्षा सिर्फ सड़क की समस्या नहीं है बल्की और भी कारण हैं। इन सभी कारणां को ध्यान में रखकर नया मोटर व्हीकल एक्ट संसद में विचाराधीन हैं। सड़क दुर्घटनाएं घटाने के लिए कुछ उपायों पर काम हो रहा है।

1. सड़कों की टेक्नोलॉजी में पैदल चलने वालों से लेकर वाहन चालकों तक सभी यूज़र्स का ध्यान रखा गया हो।

2. जगरूकता सभी उपयोगकर्ताओं खासतौर पर बच्चों को सड़क के नियमों से वाकिफ कराना ताकि वे बड़े होकर वे नियमों का पालन करने वाले नागरीक बनकर सड़क सुरक्षा बनाने में योगदान दे सकें। हेलमेट पहन कर दो पहिया वाहन चलाना, कार में सीट बेल्ट लगाना, शराब पीकर वाहन न चलाना, गाड़ी गतिसीमा में चलाना, जेब्रा क्रॉसिंग पर ही सड़क पार करना आदि पर ही जोर दिया जाये।

3. नियमों को अमल में लाना चुनौती होती है। नए कानून में पेनल्टी कई गुना बढ़ाने के साथ इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम (आईटीएस) पर जौर है ताकि सारा नियंत्रण टेक्नोलॉजी से हो नियमों का उल्लंघन करने वाले बच सके।

4. वाहनों में सीट बेल्ट, ऐयर बैग आदि सुरक्षा उपायों की मौजूदगी और उनके उपयोग पर जोर दिया गया है।

5. पुलिस पूछताछ के डर से लोग दुर्घटना में घायल लोगो को अस्पताल पहुंचाने में झिझकते हैं।

सरकार ने हाल ही में ‘गुड समारिटन लॉॅ बनाया, जिसके तहत घायलों की मदद करने वाले लोगो से पुलिस कोई पुछताछ नहीं करेगी। आम जनता को घायलों को हैंडल करने की ट्रेनिंग जरूरी है। एबुलेंस की सेवा ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध कराने से घायलों को घटना के एक घंटे के अंदर अस्पताल पहुॅचाया जा सकता है। इससे उनके बचने की संभावना बढ़ जाती है। साथ ही ट्रोमा केयर सेंटर और रिहेबिलिटेशन सेंटर भी खालने होंगे। कई सरकारी, गैर-सरकारी और निजि संस्थान इन उपयों पर काम कर रहे हैं। नतीजा यह है कि सड़क दुर्घटनाओं में मौतों की संख्या करीब 3-4 साल में स्थिर है, जबकी जनसंख्या और वाहनों की संख्या में वृद्धि हुई है।

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