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Nuclear Energy in India

Blog Written by: Dr. Hemendra Singh

परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy) वह शक्ति है जो किसी परमाणु के केंद्र यानी नाभिक से निकलती है। यह ऊर्जा परमाणुओं को आपस में बांधकर रखने वाले बलों से आती है। इसे परमाणु के टूटने या जुड़ने की वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के जरिए बहुत बड़ी मात्रा में बाहर निकाला जाता है

परमाणु ऊर्जा प्राप्त करने की विधियाँ

  • भारत की ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ रही है और स्वच्छ ऊर्जा के प्रति उसकी प्रतिबद्धताएँ दृढ़ हैं। परमाणु ऊर्जा विद्युत का एक बेस लोड स्रोत है, जो चौबीसों घंटे उपलब्ध रहता है, और इसके जीवनचक्र उत्सर्जन जल और पवन जैसे नवीकरणीय स्रोतों के तुलनीय हैं। यह डेटा केंद्रों, उन्नत उद्योगों और उभरती प्रौद्योगिकियों की निरंतर बनी रहने वाली विद्युत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विशिष्ट रूप से उपयुक्त है। इसलिए परमाणु क्षमता का विस्तार भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव के लिए केवल एक रणनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक आवश्यकता है।

  • भारत ने वर्ष 2047 तक परमाणु विद्युत क्षमता को 8.78 GW से बढ़ाकर 100 GW करने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य विकसित भारत, 2070 के नेट-ज़ीरो लक्ष्य तथा विश्वसनीय कम-कार्बन बिजली की आवश्यकता से जुड़ा है। 
  • जुलाई 2026 तक भारत में 24 परिचालित परमाणु रिएक्टरों की कुल स्थापित क्षमता 8.78 GW थी और 2025–26 में कुल विद्युत उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 3.1% थी।
  • भारत ने अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण उपलब्‍धि तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) के  6 अप्रैल 2026 को सफलतापूर्वक अपनी प्रथम क्रिटिकैलिटी (स्व-धारित नाभिकीय श्रृंखला अभिक्रिया की स्थिति) प्राप्त कर की, जो एक सतत् परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया की शुरुआत का संकेत है। यह पीएफबीआर एक 500 मेगावाट विद्युत (एमडब्ल्यूई) रिएक्टर है, जिसे भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (भाविनी) द्वारा कल्पक्कम नाभिकीय परिसर में निर्मित किया गया है।
  • इस उपलब्धि के साथ, भारत आधिकारिक रूप से अपने तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण में प्रवेश कर गया है, जिसकी परिकल्पना सबसे पहले भारत के परमाणु कार्यक्रम के वास्तुकार डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने की थी। यह कीर्तिमान वैश्विक स्तर पर भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूर्ण रूप से संचालन में आने के बाद, भारत रूस के बाद दुनिया का दूसरा देश बन जाएगा जो एक वाणिज्यिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का संचालन करेगा। यह भारत को वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने के अपने लक्ष्य के और निकट लाता है।

क्रिटिकैलिटी क्या है?

क्रिटिकैलिटी वह बिंदु है जिस पर एक सतत् और नियंत्रित नाभिकीय विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया प्रारंभ होती है। इस अवस्था में विखंडन से उत्पन्न न्यूट्रॉन की संख्या अवशोषण और रिसाव के चलते खोए गए न्यूट्रॉनों के बराबर होती है, जिससे स्थिर ऊर्जा उत्पादन प्राप्त होता है। यह निर्माण चरण से संचालन चरण में परिवर्तन को दर्शाता है और ऊष्मा तथा अंततः विद्युत उत्पादन की दिशा में पहला आवश्यक कदम है।

पीएफबीआर: एक अवलोकन

पीएफबीआर स्वदेशी अनुसंधान, डिजाइन और अभियांत्रिकी में लगे दशकों के प्रयास को दर्शाता है। इसकी प्रौद्योगिकी का विकास परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन एक अनुसंधान एवं विकास केंद्र, इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (आईजीसीएआर) द्वारा किया गया था।

वर्तमान स्थिति व लक्ष्य

परमाणु विस्तार की आवश्यकता :

 1. बढ़ती बिजली मांग

औद्योगीकरण, शहरीकरण, एयर-कंडीशनिंग इलेक्ट्रिक वाहन, डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर निर्माण, ग्रीन हाइड्रोजन तथा डिजिटलीकरण के कारण भारत की बिजली मांग तेजी से बढ़ेगी। परमाणु ऊर्जा कोयले पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ाए बिना इस बढ़ती मांग के एक भाग की पूर्ति कर सकती है।

 2. 24×7 निम्न-कार्बन बिजली

सौर और पवन ऊर्जा की उत्पादन-प्रकृति मौसम और समय पर निर्भर है। इसके विपरीत, परमाणु संयंत्र लंबी अवधि तक लगातार बिजली प्रदान कर सकते हैं, केवल नियोजित ईंधन-भराई और रखरखाव अवरोधों को छोड़कर।

 3. नेट-ज़ीरो एवं डीकार्बोनाइजेशन : भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य रखा है। परमाणु ऊर्जा जीवन-चक्र स्तर पर कम-कार्बन स्रोत है और इसका उपयोग निम्न क्षेत्रों के डीकार्बोनाइजेशन में किया जा सकता है:

  • विद्युत परिवहन और रेल।
  • इस्पात, उर्वरक तथा रसायन उद्योग।
  • भवनों का ताप एवं शीतलन।
  • विलवणीकरण।
  • कम-कार्बन हाइड्रोजन उत्पादन।
  • औद्योगिक प्रक्रिया-ऊष्मा।

4. ऊर्जा सुरक्षा :  तेल और LNG के विपरीत, परमाणु ईंधन की ऊर्जा-घनता बहुत अधिक है। कम मात्रा में ईंधन से वर्षों तक बिजली उत्पादन संभव हो सकता है। इससे समुद्री मार्गों, युद्धों, प्रतिबंधों और अल्पकालिक आपूर्ति व्यवधानों के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

5. कच्चे तेल की तुलना में परमाणु ऊर्जा : कच्चे तेल की तुलना  में यूरेनियम का भंडारण और ऊर्जा अधिक मात्रा में आशानी से प्राप्त की जा सकती है।

 

100 GW लक्ष्य की चुनौतियाँ :

 1. अभूतपूर्व विस्तार की चुनौती: भारत को 2047 तक 8.78 GW से 100 GW तक पहुँचना है, अर्थात लगभग 91 GW से अधिक नई क्षमता जोड़नी होगी। इसके लिए भारत को अपनी ऐतिहासिक निर्माण और कमीशनिंग गति से कई गुना तेजी लानी होगी।

 2. लंबी परियोजना अवधि : परमाणु परियोजनाओं में निम्न चरण समय लेते हैं:

1. स्थल चयन और भूमि अधिग्रहण।

2. पर्यावरणीय और नियामकीय स्वीकृति।

3. डिजाइन, उपकरण निर्माण और निर्माण कार्य।

4. सुरक्षा समीक्षा।

5. ईंधन लोडिंग और फर्स्ट क्रिटिकलिटी।

6. ग्रिड समकालिकरण।

7. शक्ति-वृद्धि परीक्षण।

8. वाणिज्यिक संचालन।

3. वित्तपोषण और लागत वृद्धि : 100 GW तक पहुंचने के लिए बहु-लाख-करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी। परमाणु परियोजनाओं की समस्या यह है कि उनका आरंभिक पूंजी-व्यय बहुत अधिक होता है और विलंब होने पर ब्याज तथा निर्माण लागत तेजी से बढ़ती है।

मुख्य जोखिम:- निर्माण में देरी, विदेशी उपकरण की आपूर्ति में बाधा, विनिमय दर जोखिम ,ठेकेदार क्षमता की कमी ,डिस्कॉम द्वारा महंगी बिजली के लिए दीर्घकालिक PPA करने में अनिच्छा, निजी निवेशकों के लिए अस्पष्ट दायित्व और नियामकीय जोखिम।

4. आयातित यूरेनियम पर निर्भरता : 100 GW के परमाणु बेड़े के लिए यूरेनियम की आवश्यकता काफी बढ़ेगी। भारत के पास कज़ाखस्तान, कनाडा, उज़्बेकिस्तान, रूस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ आपूर्ति-सहयोग है, लेकिन कुछ आपूर्तिकर्ताओं पर अधिक निर्भरता जोखिम उत्पन्न कर सकती है।

संभावित जोखिम: भू-राजनीतिक संघर्ष और प्रतिबंध।

  • युद्ध या समुद्री मार्गों में व्यवधान।
  • परिवहन और बीमा की बाधाएँ।
  • भुगतान प्रणाली पर प्रतिबंध।
  • यूरेनियम रूपांतरण और संवर्द्धन क्षमता का वैश्विक संकेंद्रण।
  • रिएक्टर-विशिष्ट ईंधन-असेंबली की निर्भरता।

बाधाएँ:- कई क्षेत्रों में निम्न-ग्रेड अयस्क।

  • उच्च खनन और प्रसंस्करण लागत।
  • भूमि अधिग्रहण।
  • भूजल और पर्यावरणीय चिंताएँ।
  • खनन अपशिष्ट।
  • स्थानीय समुदायों का विरोध।

 6. विदेशी प्रौद्योगिकी पर निर्भरता

7. रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन

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