India’s Membership in NATO and Current Issues

India's Membership in NATO and Current Issues
सुर्ख़ियों में- India’s Membership in NATO and Current Issues
  • हाल ही में पिछले कुछ वर्षों से भारत और अमेरिका के मध्य बढ़ते रक्षा संबंधों, यूरोपीय देशों के साथ भारत के बढ़ते सामरिक संबंधों व भारत के क्वाड में शामिल होने के बाद भारत और वैश्विक स्तर पर रक्षा विशेषज्ञों ने भारत को नाटों की सदस्यता ग्रहण करने की बात कही है।
  • पिछले वर्ष अमेरिकी सीनेट ने भारत को नाटो देशों के समान दर्जा देने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जिससे रक्षा संबंधों में अमेरिका भारत के साथ अपने दुसरे नाटो सहयोगियों की तर्ज़ पर उन्नत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण करेगा यानी एडवांस्ड तकनीक भारत को देगा। अमेरिका द्वारा भारत को नाटो देशों के समान दर्जा देने के बाद रक्षा और सामरिक साझेदारी को बढ़ाने के लिए अमेरिका के शस्त्र निर्यात नियंत्रण अधिनियम के तहत भारत में काम होगा।
Samyak IAS

भारत के नाटो सदस्य बनने के पक्ष में तर्क
  1. चीन का बढ़ता वैश्विक प्रभाव- लगभग एक दशक पहले चीन दुनिया के सामने एक विनम्र चेहरा पेश किया करता था मगर आज के समय में चीन का बढ़ता वैश्विक प्रभाव भारत को नए और सामूहीक रक्षा संबंधों को तलाशने को मजबूर कर रहा है क्योंकि भारत-चीन के मध्य सीमा विवाद किसी भी हालत में भारत को नुकसान कर सकता है।
  2. भारत की गुटनिरपेक्ष नीति और शीत युद्ध- द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के काल में संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत रूस के बीच उत्पन्न तनाव की स्थिति को शीत युद्ध के नाम से जाना जाता है। उस समय अमेरिका के नेतृत्व में North Atlantic Treaty Organization (NATO) और सोवियत संघ के नेतृत्व में बना Warsaw Pact बना था। इन दोनों में भारत ने शामिल न होकर गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया था। मगर आज के समय में शीत युद्ध की समाप्ति ने भारत की इस नीति को अप्रभावी बना दिया है।
  3. NATO की सामूहिक सुरक्षा की प्रतिब्धता- सामूहिक रक्षा का मतलब है कि एक सहयोगी के खिलाफ एक हमले को सभी मित्र राष्ट्रों के खिलाफ हमला माना जाता है। North Atlantic Treaty Organization (NATO) का Article-5 सामूहिक रक्षा का सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है, यह नाटो की संस्थापक संधि के केंद्र में है। यह एक अनूठा और स्थायी सिद्धांत बना हुआ है जो अपने सदस्यों को एक साथ बांधता है, उन्हें एक दूसरे की रक्षा करने और गठबंधन के भीतर एकजुटता की भावना स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध करता है। यह सामूहिक सुरक्षा की प्रतिब्धता चीन और पाकिस्तान के लिए घातक सिद्ध हो सकती है और वर्तमान में भारत को इसकी जरूरत है।
  4. वर्तमान में भारत के नाटो के सदस्यों के साथ रिश्ते – भारत वर्तमान में नाटो के सदस्य देशों के साथ अलग-अलग सामरिक रक्षा संबंधों को मजबूत कर रहा है, अगर भारत नाटो की सदस्यता ग्रहण करता है तो भारत इन सबसे सामूहिक रूप से व एक समय में संबंध बना पायेगा।
भारत के नाटो सदस्य बनने के विपक्ष में तर्क
  1. भारत की गुटनिरपेक्ष नीति- भारत गुट निरपेक्षता का मुख्य शिल्पी होने और गुट-निरपेक्ष आंदोलन का अग्रणी सदस्य होने के नाते भारत ने इसके विकास में एक सक्रिय भूमिका निभाई है। गुट निरपेक्ष आंदोलन सभी सदस्य राष्ट्रों को उनके आकार और महत्व के आधार के बिना ही उन्हें विश्व राजनीति और विश्व संबंधी निर्णय लेने के अवसर प्रदान करता है। अगर भारत नाटो सदस्यता ग्रहण करता है तो भारत अपनी स्वतंत्र नीति को खो देगा।
  2. विकासशील देशों का नेतृत्व- भारत वर्तमान में विकासशील देशों का नेतृत्व करता है और भारत इस गूट में सम्मलित होता है तो अन्य विकासशील देश भी इसमें शामिल होगे जो इन देशों के विकास के आयामों को बदल देगा और विकास की राह में बाधा उत्पन्न करेगे।
  3. भारत-रूस संबंध: नाटो का सदस्य बनने से भारत और रूस संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इससे भारत अपना एक मित्र राष्ट्र खो सकता है। इसके अलावा रूस-चीन के संबंधों में मजबूती आ सकती है, जो भारत के लिए घातक होगा।
  4. नाटो की वर्तमान में कमजोर होती पहचान- वर्तमान में नाटो सदस्य देश वित्तीय बोझ को साझा करते है जिसमें अमेरिका सर्वाधिक साझा करता है। जबकि अमेरिका ने पूर्व में ही कहा था की नाटो का सैन्य बोझ अमेरिका के साथ अन्य देशों को भी एक समान उठाना चाहिये।
  5. नाटो में विरोध के स्वर- हाल ही में तुर्की ने नाटो के महत्व को नकारा है। अत: वर्तमान में नाटो अपने पुराने महत्व को स्थापित नहीं कर पा रहा है।
Samyak IAS

नाटो की सदस्यता से भारत को होने वाले फायदे-
  • नाटो की सदस्यता के बाद भारत के लिए एक साझा-लागत के आधार पर रक्षा विभाग (डीओडी) के साथ सहकारी अनुसंधान और विकास परियोजनाओं के लिए एक मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
  • नाटो की सदस्यता के बाद आतंकवाद निरोधी पहल में भागीदारी, घटे हुए यूरेनियम एंटी-टैंक राउंड की खरीद, जहाजों और सैन्य रसद की प्राथमिकता वितरण, और अमेरिकी सैन्य ठिकानों के बाहर रखे गए रक्षा विभाग के स्वामित्व वाले उपकरणों के वॉर रिजर्व स्टॉक्स का भारत प्रयोग कर पायेगा।
  • नाटो की सदस्यता के बाद भारत को ऋण के रूप में विकास परियोजनाओं के लिए उपकरण और अनुसंधान सामग्री लेने, कुछ रक्षा उपकरणों की खरीद या पट्टे के लिए अमेरिकी वित्त व्यवस्था का उपयोग करने और जल्द से जल्द अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का निर्यात करने का रास्ता खुलेगा।
North Atlantic Treaty Organization (NATO)
पृष्ठभूमि-
  • द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् सोवियत संघ और अमेरिका के बीच शीत युद्ध का प्रखर विकास हुआ। फुल्टन भाषण व टू्रमैन सिद्धान्त के तहत जब साम्यवादी प्रसार को रोकने की बात कही गई तो प्रत्युत्तर में सोवियत संघ ने अंतर्राष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन कर 1948 में बर्लिन की नाकेबन्दी कर दी।
  • इसी क्रम में यह विचार किया जाने लगा कि एक ऐसा संगठन बनाया जाए जिसकी संयुक्त सेनाएँ अपने सदस्य देशों की रक्षा कर सके।
  • बर्लिन की घेराबन्दी और बढ़ते सोवियत प्रभाव को ध्यान में रखकर अमेरिका ने स्थिति को स्वयं अपने हाथों में लिया और सैनिक गुटबन्दी दिशा में पहला अति शक्तिशाली कदम उठाते हुए उत्तरी अटलाण्टिक सन्धि संगठन अर्थात नाटो की स्थापना की।
स्थापना-
  • नाटो की स्थापना 4 अप्रैल, 1949 को वांशिगटन में हुई थी जिस पर 12 देशों ने हस्ताक्षर किए थे।
  • ये देश थे- फ्रांस, बेल्जियम, लक्जमर्ग, ब्रिटेन, नीदरलैंड, कनाडा, डेनमार्क, आइसलैण्ड, इटली, नार्वे, पुर्तगाल और संयुक्त राज्य अमेरिका।
मुख्यालय और सदस्य देश-
  • इसका मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में अवस्थित है।
  • वर्तमान में इसके सदस्य देशों की संख्या 30 है।
नाटो की स्थापना के उद्देश्य-
नाटो की स्थापना के निम्न उद्देश्य थे-
  • पश्चिम यूरोप के देशों को एक सूत्र में संगठित करना।
  • सोवियत संघ द्वारा यूरोप पर आक्रमण के समय अवरोधक की भूमिका निभाना।
  • सोवियत संघ के पश्चिम यूरोप में तथाकथित विस्तार को रोकना तथा युद्ध की स्थिति में लोगों को मानसिक रूप से तैयार करना।
  • सैन्य तथा आर्थिक विकास के लिए अपने कार्यक्रमों द्वारा यूरोपीय राष्ट्रों के लिए सुरक्षा छत्र प्रदान करना।
नाटो की संरचना-
नाटो की संरचना में चार अंगों को सम्मलित किया जाता है-
  1. परिषद- यह नाटों का सर्वोच्च अंग है।
  2. उप परिषद्- यह परिषद् नाटों के सदस्य देशों द्वारा नियुक्त कूटनीतिक प्रतिनिधियों की परिषद् है।
  3. प्रतिरक्षा समिति- इसमें नाटों के सदस्य देशों के प्रतिरक्षा मंत्री शामिल होते हैं।
  4. सैनिक समिति- इसका मुख्य कार्य नाटों परिषद् एवं उसकी प्रतिरक्षा समिति को सलाह देना है। इसमें सदस्य देशों के सेनाध्यक्ष शामिल होते हैं।
Samyak IAS

निष्कर्ष- वर्तमान में भारत के हिन्द-प्रशांत महासागर में बढ़ते महत्व और भारत की बढ़ती शक्ति का परिणाम है की भारत को नाटो की सदस्यता के लिए कहा गया। हालाँकि भारत के वर्तमान सक्रिय दृष्टिकोण को देखे तो भारत को विकासशील से विकसित देश की यात्रा के लिए खुद की स्वतंत्र नीति की आवश्यकता होगी। अत: भारत को इस संदर्भ में अपने हितों के मध्य नजर रखते हुये फ़ैसला लेना चाहिये।